गैनोडरमा मशरूम (Guanoderma mushrooms)

गैनोडरमा मशरूम (Guanoderma mushrooms)


यह एक सख्त एवं वर्षा ऋतू में सूखे या जीवित वृक्षों की जड़ो के पास उगती है। इसका रंग गहरा लाल, भूरा एवं स्लेटी होता है। प्रकृति में इसकी कई प्रजातियां पाई जाती है। ताजा मशरूम गूदेदार होती है एवं सूखने पर यह कड़क हो जाती है।

उत्पादन
इसके औषधीय महत्व को देखते हुए पूर्वी देशों में इसके उत्पादन की विधि विकसित की गई है। परन्तु जलवायु की विभिन्नता एवं विशेष प्रकार के कृषि अवशेषों की उपलब्धता के कारण इसके उत्पादन का तरीका कुछ भिन्न है

माध्यम तैयार करना
इस mushroom के लिए गेहूं का भूसा तथा लकड़ी का बुरादा 1:3 लिए जाते है। दोनों को करीब 20 घंटे तक अलग-अलग गलाने के पश्चात् इसे बाहर निकाल कर अतिरिक्त पानी को निथार कर दोनों को बराबर मात्रा 75% के लगभग होनी चाहिए।
इसके बाद दोहरी की हुई थैलियों में ऊपर की और प्लास्टिक की वलय एवं डाट लगा देते है। इसके ऊपर कागज तथा बर बेंड लगाकर इसे ऑटोक्लेव में 15 पोंड डाब पर डेढ़ से डप घंटे के लिए निर्जीवीकरण करते है। इसके बाद इसे ठंडा होने के लिए रख देते है।
बीज तैयार करना
उपरोक्त विधि से तैयार मिश्रण में 3% गीले मिश्रण के हिसाब से बीजाई करते है, फिर इसे 30-35 डिग्री से. तापमान पर बीज बढ़वार के लिए रख देते है। लगभग 5 सप्ताह में बीज बढ़वार पूर्ण हो जाती है।

मशरूम तुड़ाई
काट लगी हुई थैलियों से कुछ दिनों के बाद मशरूम निकलना प्रारम्भ हो जाती है, बढ़वार धीरे-धीरे होती है। करीब 3-5 सप्ताह में यह परिपक्व हो जाती है। संग्रह करने के लिए मशरूम को घुमाकर तोड़ लिया जाता है। इसे सुखाकर इसका पाउडर बनाकर लम्बे समय तक संग्रहित किया जा सकता है।
बाजार भाव


अभी राजस्थान में इस मशरूम को बाजार में नहीं बेचा जाता है लेकिन कुछ व्यवसायिक उत्पाद जैसे कैप्सूल (डी.एक्स.एन.) एवं पाउडर बाजार में रूपये 1100 पर 100 कैप्सूल की दर से एवं रूपये 1150(50 ग्राम पाउडर) बाजार में विक्रय के लिए उपलब्ध है।
भारत सरकार की संस्था आई.सी.ए.आर. द्वारा प्राप्त निर्देशों के अनुसार इस मशरूम का उत्पादन अत्यंत नियंत्रित रूप से करना होगा। उत्पादन के उपरांत बचे अवशेषों को पेड़ों से दूर गहरे गद्दे में डालना चाहिए। यह पेड़ों को नुकसान पैदा करती है।

बटन मशरूम (button mushroom)

बटन मशरूम (button mushroom)
बटन मशरूम सर्वाधिक लोकप्रिय एवं स्वादिष्ट मशरूम है। इसमें भी पौष्टिक तत्व अन्य मशरूम की तरह ही है। इस मशरूम का उत्पादन सर्दियों में ही किया जा सकता है। तापमान 20 से कम एवं 70% से अधिक आर्द्रता की आवश्यकता होती है। बटन मशरूम की खेती एक विशेष प्रकार की खाद पर ही की जा सकती है जिसे कम्पोस्ट कहते है।

कम्पोस्ट दो प्रकार से तैयार की जा सकती है।

  • लम्बी विधि द्वारा
  • अलप विधि द्वारा

लम्बी विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करना
इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने के लिए किसी विशेष मूल्यवान मशीनरी की आवश्यकता नहीं पड़ती है। कम्पोस्ट बनाने के लिए विभिन्न प्रकार की सामग्री काम में ली जा सकती है।
कम्पोस्ट बनाने के विभिन्न सूत्र
सूत्र – 1
गेहूं/चावल का भूसा- 1000 किलोग्राम, अमोनियम सल्फेट/कैल्शियम अमोनियम नाइट्रेट- 27 किलोग्राम, सुपरफास्फेट- 10 किलोग्राम, यूरिया-17 किलोग्राम, गेहूं का चौकर-100 किलोग्राम, जिप्सम-36 किलोग्राम।

सूत्र – 2
गेहूं/चावल का भूसा- 1000 किलोग्राम, गेहूं का चापड़- 100 किलोग्राम, सुपर फास्फेट- 10 किलोग्राम, केल्सियम अमोनियम नाइट्रेट सल्फेट(206%)-28 किलोग्राम, जिप्सम- 100 किलोग्राम, यूरिया(46% नाइट्रोजन)- 12 किलोग्राम, सल्फेट या न्यूरेट ऑफ पोटाश-10 किलोग्राम, नेमागान(60%)- 135 मिली लीटर, निलसेस-175 लीटर।
सूत्र – 3
गेहूं/चावल का भूसा- (1:1)1000 किलोग्राम, केल्सियम अमोनियम नाइट्रेट -30 किलोग्राम, यूरिया-132 किलोग्राम,  गेहूं का चौकर-50 किलोग्राम,  जिप्सम- 35 किलोग्राम, लिण्डेन(10%)-1 किलोग्राम, फार्मलीन-2 लीटर।
उपरोक्त सूत्रों के अलावा राजस्थान के वता वर्ण अनुसार उपयुक्त सूत्र निम्न है :-
गेहूं का भूसा 1000 किलोग्राम, गेहूं का चापड़- 200 किलोग्राम, यूरिया- 20 किलो, जिप्सम- 35 किलो, लिण्डेन- 1 किग्रा., फार्मलीन- 2 लीटर।

अल्प विधि द्वारा
सूत्र क्रमांक-1
गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, गेहू का चोकर-50 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-40 किलोग्राम, यूरिया-185 किलोग्राम, जिप्सम-67 किलोग्राम, लिंडन डस्ट-1 किलोग्राम।
सूत्र क्रमांक-2
गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, चावल का चोकर-68 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-400 किलोग्राम, यूरिया-20 किलोग्राम, जिप्सम-64 किलोग्राम, कपास के बीज का चोकर-17 किलोग्राम।
सूत्र क्रमांक-3
गेहू/चावल का भूसा-1000 किलोग्राम, मुर्गी की खाद-400 किलोग्राम, यूरिया-14, किलोग्राम, जिप्सम-30 किलोग्राम, ब्रूवर के दानें-72 किलोग्राम।

दीर्घ विधि से कम्पोस्ट तैयार करने की विधि:-
इस विधि द्वारा कम्पोस्ट को कम्पोस्टिंग शेड में ही तैयार किया जाता हैं। इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने में करीब २८ दिन लगते हैं। इसमें प्राप्त कम्पोस्ट की उपज लघु विधि द्वारा तैयार कम्पोस्ट से अपेक्षाकृत कम मिलती हैं सबसे पहले समतल एवं साफ फर्श पर भूसे को दो दिन तक पानी डालकर गीला किया जाता हैं।

इस गीले भूसे में जिप्सम के अलावा सारी सामग्री मिलाकर उसे थोड़ा और गिला करें। यह बात ध्यान में रखें की पानी उसमे से बहकर बाहर ही निकलें एवं लकड़ी को चौकोर बोर्ड की सहायता से 1 मीटर चौड़ा एवं 3 मीटर लम्बा (लम्बी कम्पोस्ट बोरस की मात्रा के अनुसार) और करीब 1.5 मीटर ऊँचा चौकोर ढेर बना लें। चार पांच घण्टे बाद लकड़ी के बोर्ड को तोड़कर वापस चौकोर ढेर को दो दिन तक ऐसे ही पड़ा रखें। दो दिन बाद ढेर को तोड़कर वापस चौकोर ढेर बना लें एवं ध्यान रखें की ढेर का अंदर का हिस्सा बाहर व बाहर का हिस्सा अंदर आ जाये।
इस तरह से ढेर को दो दिन के अंतराल पर तीसरे दिन पलटाई करते जाये एवं तीसरी पलटाई पर जिप्सम की पूरी मात्रा मिला दें। पानी की मात्रा यदि कम हो तो उस पर पानी छिड़क दे एवं चौकोर ढेर बना लें। पलटै करने का विवरण सरणी में दिया गया हैं।
पाईप विधि यह विधि दीर्घ कम्पोस्टिंग विधि में लगने वाले समय को कम करने के लिए हैं। इस विधि द्वारा 19-20 दिन में कम्पोस्ट तैयार हो जाती हैं। इसमें कुल 12पाइप, 4 फ़ीट आकार के जिनमे चारों और 1 इंच व्यास के छेद किये जाते हैं की आवश्यकता होती हैं।
कम्पोस्ट की शुरूआती 3 पलटाई तक विधि लम्बी विधि जैसी हैं। तीसरी पलटाई के बाद कम्पोस्ट को एक लोहे के फ्रेम के आकार में भरते समय निचे से एक फ़ीट की ऊंचाई के अंतराल में एक-एक पाईप लगाते हैं। इन्हे एक फ्रेम की सहायता से व्यवस्थित किया जाता हैं। यदि 2 टन का कम्पोस्ट बनाना हैं तो पाईप को व्यवस्थित रखने के लिए 4 फ्रेम की आवश्यकता पड़ती हैं।

इस विधि में तीसरी पलटाई के बाद हर पलटाई 4 दिन बाद की जाती हैं। लगभग 2-3 पलटाई उपरांत कम्पोस्ट तैयार हो जाता हैं। यदि अमोनिया की गन्ध हो तो एक पलटाई और की जाती हैं। इस पुरे कम्पोस्ट को 100 गेज की पॉलीथिन शिट से ढकना आवश्यक हैं एवं इस शीट में बड़े छेद कर दें ताकि हवा का आवागमन बना रहें।
लघु विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करना
इस विधि से तैयार किया गया कम्पोस्ट दीर्घ विधि से तैयार किये गए कम्पोस्ट से अच्छा होता हैं इस पर मशरूम की उपज भी ज्यादा मिलती हैं एवं कम्पोस्ट तैयार करने में समय कम लगता हैं। परन्तु साथ ही इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने में लागत भी ज्यादा आती हैं और कुछ यंत्रों की आवश्यकता होती हैं जैसे कम्पोस्ट शेड, बल्क पाश्चुराइजेशन कमरा या टनल, पीक हीटिंग कमरा इत्यादि।
कम्पोस्ट यार्ड
एक मध्यम आकर के मशरूम फार्म के लिए 100′ लम्बाई एवं 40′ चौड़ाई वाला शेड ठीक रहता है। कम्पोस्ट यार्ड का फर्श सीमेंट का बना होना चाहिए साथ ही पानी को निचे इक्क्ठा करने के लिए गुड्डी पिट होना चाहिए। ऊपर सीमेंट की चादर या टिन शेड लगन चाहिए।
बल्क पाश्चुराइजेशन कमरा या टनल इसकी दीवारें  इंसुलेटेड होती है एवं इसमें दो फर्श होते है। पहले फर्श में 2% का ढलान दिया जाता है। इसके ऊपर लकड़ी या लोहे की जाली लगी होती है जिसके ऊपर कम्पोस्ट को रखा जाता है।

करीब 25-30% फर्श को खुला रखा जाता है जिससे भाप व् हवा का आवागमन अच्छी तरह से हो पाये। कमरे का आकार कम्पोस्ट की मात्रा पर निर्भर करता है। करीब 20-22 टन कम्पोस्ट बनाने के लिए 36′ लम्बाई, 10 फिट चौड़ाई  फिट फर्श की ऊंचाई आकार के इंसुलेटेड कमरे की आवश्यकता होती है।
इसके अलावा हमें 150 किलोग्राम/घंटा की दर से भाप बनाने वाले बायलर की आवश्यकता होती है। इसके अलावा 1450 आर.पी.एम. दबाव 100-110 मिली लीटर एवं 150-200 घनमीटर हवा प्रति घंटा प्रति ब्लेअर की आवश्यकता होती है।
जहां पर ढलान दिया जाता है वहां पर भाप एवं हवा के पाइप खुलते है जो की ब्लोअर से जुड़े रहते है। ब्लोअर , प्लेनम के नीचे लगा रहता है एवं भूमिगत कमरे में रहते है। तजा हवा, डम्पर्स की सहायता से पुनः सर्कुलेशन डक्ट से कम्पोस्ट की कंडीशनिंग की जाती है।

पाश्चुराइजेशन कक्ष में दो वेंटिलेटर ओपनिंग होती है एक अमोनियम रिसर्कुलेशन एवं अन्य गैसों के लिए एवं दूसरी तजा हवा के लिए। टनल के दोनों तरफ दरवाजे होते है एक और से कम्पोस्ट डाला जाता है और दूसरी ओर से निकाला जाता है।
उच्च तापीय कक्ष
यह सामान्य इन्सुलेटेड कक्ष होता हैं जिसमे भाप की नलियां एवं हवा के आगमन के ल

उच्च तापीय कक्ष
यह सामान्य इन्सुलेटेड कक्ष होता हैं जिसमे भाप की नलियां एवं हवा के आगमन के लिए पंखा लगा होता हैं। 24 फ़ीट लम्बाई एवं 6 फ़ीट चौड़ाई 8 फ़ीट छत की ऊंचाई का कमरा 250 ट्रे को रखने के लिए ठीक रहता हैं।
इस कक्ष का उपयोग केसिंग सामग्री को निर्जीवीकरण के लिए काम में लेते हैं।
इस विधि द्वारा कम्पोस्ट तैयार करने के लिए गेहूं/चावल का भूसा, मुर्गी की खाद बाला सूत्र काम में लिया जाता हैं।

प्रथम चरण
दीर्घ अवधि की तरह ही कम्पोस्ट बनाने के लिए भूसे को दिन तक गीला किया जाता हैं। तीसरी पलटाई तक वैसे ही पलटाई की जाती हैं जैसे दीर्घ अवधि में की जाती हैं। चौकोर ढेर बनाया जाता हैं एवं मध्य भाग में तापमान 70-80 डिग्री सेल्सियस तक हो जाता हैं एवं बाहरी हिस्से में तापमान 50-60 डिग्री सेल्सियस होता हैं।
द्वितीय चरण
द्वितीय चरण में कम्पोस्ट को टनल में डाल दिया जाता हैं एवं तापमान स्वतः ही  (6-8 घंटे में) 57 डिग्री सेल्सियस हो जाता हैं। धीरे-धीरे इनका तापमान 50 से 45 डिग्री सेल्सियस तक घटाकर ताजा हवा अंदर डालकर एवं एक्जास्ट से गर्म हवा को बाहर निकालकर किया जाता हैं।
तृतीय चरण
बहुत सारे तापमापी अलग-अलग जगह पर टनल में लगा दिये जाते हैं। जिससे की टनल के अंदर का तापमान देखा जा सकें। एक तापमापी को प्लेनम में रखा जाता हैं एवं 2-3 तापमापी को कम्पोस्ट ढेर में रखा जाता हैं। दो तापमापियों को कम्पोस्ट ढेर के ऊपर रखा जाता हैं। दरवाजें को बन्द करके, ब्लोअर के पंखे को चालू करने से कम्पोस्ट का तापमान 45 डिग्री सेल्सियस आ जाता हैं।

यह ध्यान में रखना चाहिये की टनल के अंदर ही हवा के तापमान का अंतर 3 डिग्री सेल्सियस से अधिक न हो,जैसे ही कम्पोस्ट का तापमान 45 डिग्री हो, ताजा हवा रोक देनी चाहिये। धीरे-धीरे स्वतः ही तापमान 1.2 डिग्री सेल्सियस प्रति घंटा की दर से बढ़ने लगता हैं एवं 57 डिग्री सेल्सियस हो (10-12 घंटे में) तापमान मिल जाता हैं। इस तापमान पर कम्पोस्ट को 6-8 घंटे रखा जाता हैं ताकि उसका पाश्चुरीकरण अच्छी तरह से हो सकें। ताजा हवा के प्रवाह के लिए डक्ट को खोल देते हैं (लगभग 10%) इस प्रकार कम्पोस्ट के पाश्चुरीकरण के बाद उसकी कंडीशनिंग की जाती हैं।
कम्पोस्ट की कंडीशनिंग
उपरोक्त पाश्चुरीकरण कम्पोस्ट में कुछ ताजा हवा देने से इस भाप की सप्लाई बंद करके उसका तापमान 4 डिग्री  सेल्सियस तक लाया जाता हैं इस तापमान पर आने में लगभग तीन दिन का समय लगता हैं एवं अमोनिया की मात्रा 10 पी.पी.एम. से कम हो जाती हैं। इस कंडीशनिंग के बाद कम्पोस्ट को 25 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस तक ठण्डा किया जाता हैं। और इसके लिए ताजा हवा के प्रवाह का उपयोग किया जाता हैं।

इस प्रकार पूरी प्रक्रिया में 7-8 दिन लगते हैं पास्चुरीकरण एवं कंडीशनिंग के समय 25-30% कम्पोस्ट का वजन कम हो जाता हैं यदि हम 20 टन कम्पोस्ट बनाना चाहते हैं तो हमे लगभग 28 टन कम्पोस्ट टनल में भरना चाहिये। जिसके लिए 12 टन कच्चे माल की आवश्यकता होगी। यानि कुल कच्चे माल का 2 से 2.5 गुना कम्पोस्ट अंत में प्राप्त होता हैं।

अच्छे कम्पोस्ट की पहचान

कम्पोस्ट बनने के बाद हमे कुछ बाते ध्यान में रखनी चाहिये जैसे की कम्पोस्ट का रंग गहरा भूरा होना चाहिये, यह हाथ पर चिपकना नहीं चाहिये, इसमें से अच्छी खुशबु आती हो, अमोनिया की गनध नहीं हो, नमी की मात्रा 68-72% एवं पी.एच. 7.2-7.8 होना चाहिये। यह भी ध्यान रखना चाहिये की उसमे किसी प्रकार के कीड़े, निमेटोड एवं दूसरी फफूंद न हो। यह पहचान लम्बी विधि द्वारा बनाये बिजाई कम्पोस्ट पर भी लागु होती हैं।

बिजाई (स्पानिंग)



मशरूम का बीज ताजा, पूरी बढ़वार लिए एवं अन्य फफूंद से मुक्त होना चाहिये। कई लोग 1.5 किलो बीज भी उपयोग में लेते हैं। परन्तु यह कम्पोस्ट का तापमान बढ़ा देता हैं। बीज की मात्रा 1 क्विंटल कम्पोस्ट में 750 ग्राम से 1 किलोग्राम के आसपास होनी चाहिये। इस बीज/स्पॉन को कम्पोस्ट में अच्छी तरह मिलाकर उसे या तो पॉलीथिन की थैलियों (12 इंच) या पॉलीथिन शीट (6-8 इंच) पर शेल्फ में भर देना चाहिये।
पॉलीथिन की थैलियों को ऊपर से मोड़कर बंद कर देना चाहिये जबकि शेल्फ पर अकबार ढक देना चाहिये। थैलियां 8 किलो कम्पोस्ट भरने के लिए उपयुक्त हो, इससे उत्पादन 10 किलो कम्पोस्ट के बराबर मिलता हैं।
इस समय का तापमान 25 डिग्री सेल्सियस से कम एवं नमी 70% रखनी चाहिये। करीब 15 दिन बाद उसके अंदर स्पॉन रन पूरा हो जाता हैं और इसके बाद केसिंग की आवश्यकता होती हैं।

केसिंग



जैसे ही स्पॉन रन पूरा हो जाता हैं उसके बाद केसिंग मिट्टी के लिए उपयुक्त मिश्रण इस प्रकार हैं:
बगीचे की खाद (एफ.वाई.एम.)+दोमट मिट्टी- 1:1
एफ.वाई.एम.+ दो साल पुरानी बटन मशरूम की खाद-1:1
एफ.वाई.एम.+ दोमट मिट्टी+रेती+2 साल पुरानी बटन मशरूम की खाद- 1:1:1:1
उपरोक्त किसी भी एक मिश्रण को लेवें परन्तु मिश्रण-२ सर्वाधिक उपयुक्त एवं अधिक उपज देने वाला हैं। एवं 8 घंटे तक पानी में भिगोना चाहिये। करीब 8 घंटे के बाद पानी से निकलकर सूखा कर केसिंग मिट्टी का निर्जीवीकरण, फार्मलीन के 6% घोल से करना चाहिये एवं उसे 48 घंटे बंद रखना चाहिये।
इसके बाद इसे खोलकर 24 घंटे फैलाकर रखें ताकि मिश्रण सुख जाए और स्पॉन राण कंपसट पर 1 इंच मोटी परत लगानी चाहिए एवं पानी इस तरह छिड़के की केवल केसिंग ही गीली हो। कमरे का तापमान 20 डिग्री सेल्सियस से कम होना चाहिए एवं नमी 70-90% के बिच होनी चाहिए साथ ही हवा का आवागमन होना चाहिए।
केसिंग मिश्रण की पानी सोखने की क्षमता 75% के आसपास, पी. एच. 7.7-7.8 केसिंग मिट्ठी का धनत्व 0.75-0.80 ग्राम/मिलीलीटर तथा पोरोसिटी व इ.सी. कम होनी चाहिए।
केसिंग करने के लगभग 10-12 दिन पश्चात् इसमें छोटे-छोटे मशरूम के अंकुरण बनने शुरू हो जाते है। इस समय केसिंग पर 0.3% केल्सियम क्लोराइड का छिड़काव दिन एक बार पानी के साथ जरूर करना चाहिए और इसको मशरूम तोड़ने तक बराबर करते रहना चाहिए।

जो अगले 5-7 दिनों में बढ़कर पूरा आकर ले लेते है। इन्हे घुमाकर तोड़ लेना चाहिए, तोड़ने के बाद निचे की मिट्ठी लगे तने के भाग को चाकू  से काट देना चाहिए एवं आकर के अनुसार छांट लेना चाहिए।
एक बार केसिंग में लगाने के बाद करीब 80 दिन तक फसल प्राप्त होती रहती है। कुल उपज 1 क्विंटल कम्पोस्ट पर 15-18 किलो के लगभग प्राप्त होती है। जब कम्पोस्ट लघु विधि से बनाया गया हो तो उपज 20-25 किलोग्राम तक प्राप्त होती है।
एक किलो मशरूम उत्पादन की लागत 20-22 रूपये के बीच आती है एवं बाजार में इसका मूल्य 120-125 रूपये प्रति किलोग्राम तक मिल जाता है।

मशरूम की खेती

मशरूम की खेती के लिए दिशानिर्देश

हजारों वर्षों से विश्‍वभर में मशरूमों की उपयोगिता भोजन और औषध दोनों ही रूपों में रही है। ये पोषण का भरपूर स्रोत हैं और स्‍वास्‍थ्‍य खाद्यों का एक बड़ा हिस्‍सा बनाते हैं। मशरूमों में वसा की मात्रा बिल्‍कुल कम होती हैं, विशेषकर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट की तुलना में, और इस वसायुक्‍त भाग में मुख्‍यतया लिनोलिक अम्‍ल जैसे असंतप्तिकृत वसायुक्‍त अम्‍ल होते हैं, ये स्‍वस्‍थ ह्दय और ह्दय संबंधी प्रक्रिया के लिए आदर्श भोजन हो सकता है। पहले, मशरूम का सेवन विश्‍व के विशिष्‍ट प्रदेशों और क्षेत्रों त‍क ही सीमित था पर वैश्‍वीकरण के कारण विभिन्‍न संस्‍कृतियों के बीच संप्रेषण और बढ़ते हुए उपभोक्‍तावाद ने सभी क्षेत्रों में मशरूमों की पहुंच को 

सुनिश्चित किया है। मशरूम तेजी से विभिन्‍न पाक पुस्‍तक और रोजमर्रा के उपयोग में अपना स्‍थान बना रहे हैं। एक आम आदमी को रसोई में भी उसने अपनी जगह बना ली है। उपभोग की चालू प्रवृत्ति मशरूम निर्यात के क्षेत्र में बढ़ते अवसरों को दर्शाती है।
भारत में उगने वाले मशरूम की दो प्र‍जातियां 

  • वाईट बटन मशरूम और
  • ऑयस्‍टर मशरूम है। 

हमारे देश में होने वाले वाईट बटन मशरूम का ज्‍यादातर उत्‍पादन मौसमी है। इसकी खेती परम्‍परागत तरीके से की जाती है। सामान्‍यता, अपॉश्‍चयरीकृत कूडा खाद का प्रयोग किया जाता है, इसलिए उपज बहुत कम होती है। तथापि पिछले कुछ वर्षों में बेहतर कृषि-विज्ञान पदधातियों की शुरूआत के परिणामस्‍वरूप मशरूमों की उपज में वृद्धि हुई है। आम वाईट बटन मशरूम की खेती के लिए तकनीकी कौशल की आवश्‍यकता है।

 अन्‍य कारकों के अलावा, इस प्रणाली के लिए नमी चाहिए, दो अलग तापमान चाहिए अर्थात पैदा करने के लिए अथवा प्ररोहण वृद्धि के लिए (स्‍पॉन रन) 220-280 डिग्री से, प्रजनन अवस्‍था के लिए (फल निर्माण) : 150-180 डिग्री से; नमी: 85-95 प्रतिशत और पर्याप्‍त संवातन सब्‍स्‍ट्रेट के दौरान मिलना चाहिए जो विसंक्रमित हैं और अत्‍यंत रोगाणुरहित परिस्थिति के तहत उगाए न जाने पर आसानी से संदूषित हो सकते हैं। अत: 100 डिग्री से. पर वाष्‍पन (पास्‍तुरीकरण) अधिक स्‍वीकार्य है।

प्‍लयूरोटस, ऑएस्‍टर मशरूम का वैज्ञानिक नाम है। भारत के कई भागों में, यह ढींगरी के नाम से जाना जाता है। इस मशरूम की कई प्रजातिया है उदाहणार्थ :-

  • प्‍लयूरोटस ऑस्‍टरीयटस, 
  • पी सजोर-काजू, 
  • पी. फ्लोरिडा, पी. सैपीडस,
  • पी. फ्लैबेलैटस, 
  • पी एरीनजी तथा कई अन्‍य भोज्‍य प्रजातियां

मशरूम उगाना एक ऐसा व्‍यवसाय है, जिसके लिए अध्‍यवसाय धैर्य और बुद्धिसंगत देख-रेख जरूरी है और ऐसा कौशल चाहिए जिसे केवल बुद्धिसंगत अनुभव द्वारा ही विकसित किया जा सकता है।
प्‍लयूरोटस मशरूमों की प्ररोहण वृद्धि (पैदा करने का दौर) और प्रजनन चरण के लिए 200-300 डिग्री का तापमान होना चाहिए। मध्‍य समुद्र स्‍तर से 1100-1500 मीटर की ऊचांई पर उच्‍च तुंगता पर इसकी खेती करने का उपयुक्‍त समय मार्च से अक्‍तूबर है, मध्‍य समुद्र स्‍तर से 600-1100 मीटर की ऊचांई पर मध्‍य तुंगता पर फरवरी से मई और सितंबर से नवंबर है और समुद्र स्‍तर से 600 मीटर नीचे की निम्‍न तुंगता पर अक्‍तूबर से मार्च है।

आवश्‍यक सामान
1.      धान के तिनके – फफूंदी रहित ताजे सुनहरे पीले धान के तिनके, जो वर्षा से बचाकर किसी सूखे स्‍थान पर रखे गए हो।
2.      400 गेज के प्रमाप की मोटाई वाली प्‍लास्टिक शीट – एक ब्‍लाक बनाने के लिए 1 वर्ग मी. की प्‍लास्टिक शीट  चाहिए।
3.      लकड़ी के सांचे – 45X30X15 से. मी. के माप के लकड़ी के सांचे, जिनमें से किसी का भी सिरा या तला न हो, पर 44X29 से. मी. के आयाम का एक अलग लकड़ी का कवर हो।
4.      तिनकों को काटने के लिए गंडासा या भूसा कटर।
5.      तिनकों को उबालने के लिए ड्रम (कम से कम दो)
6.      जूट की रस्‍सी, नारियल की रस्‍सी या प्‍लास्टिक की रस्सियां
7.      टाट का बोरे
8.      स्‍पान अथवा मशरूम जीवाणु जिन्‍हें सहायक रोगविज्ञानी, मशरूम विकास केन्‍द्र, से प्रत्‍येक ब्‍लॉक के लिए प्राप्‍त किया जा सकता है।
9.      एक स्‍प्रेयर
10.  तिनकों के भंडारण के लिए शेड 10X8 मी. आकार का

प्रक्रिया :
कूड़ा खाद तैयार करना

कूड़ा खाद बनाने के लिए अन्‍न के तिनकों (गेंहू, मक्‍का, धान, और चावल), मक्‍कई की डंडिया, गन्‍ने की कोई जैसे किसी भी कृषि उपोत्‍पाद अथवा किसी भी अन्‍य सेल्‍यूलोस अपशिष्‍ट का उपयोग किया जा सकता है। गेंहू के तिनकों की फसल ताजी होनी चाहिए और ये चमकते सुनहरे रंग के हो तथा इसे वर्षा से बचा कर रखा गया है। ये तिनके लगभग 5-8 से. मी. लंबे टुकडों में होने चाहिए अन्‍यथा लंबे तिनकों से तैयार किया गया ढेर कम सघन होगा जिससे अनुचित किण्‍वन हो सकता है। इसके विप‍रीत, बहुत छोटे तिनके ढ़ेर को बहुत अधिक सघन बना देंगे जिससे ढ़ेर के बीच तक पर्याप्‍त ऑक्‍सीजन नहीं पहुंच पाएगा जो अनएरोबिक किण्‍वन में परिणामित होगा।
गेंहू के तिनके अथवा उपर्युक्‍त सामान में से सभी में सूल्‍यूलोस, हेमीसेल्‍यूलोस और लिग्‍निन होता है, जिनका उपयोग कार्बन के रूप में मशरूम कवक वर्धन के लिए किया जाता है। ये सभी कूडा खाद बनाने के दौरान माइक्रोफ्लोरा के निर्माण के लिए उचित वायुमिश्रण सुनिश्चित करने के लिए जरूरी सबस्‍टूटे को भौतिक ढांचा भी प्रदान करता है। चावल और मक्‍कई के तिनके अत्‍यधिक कोमल होते है, ये कूडा खाद बनाने के समय जल्‍दी से अवक्रमित हो जाते हैं और गेंहू के तिनकों की अपेक्षा अधिक पानी सोखते हैं। अत:, इन सबस्‍टूट्स का प्रयोग करते समय प्रयोग किए जाने वाले पानी की प्रमात्रा, उलटने का समय और दिए गए संपूरकों की दर और प्रकार के बीच समायोजन का ध्‍यान रखना चाहिए। चूंकि कूड़ा खाद तैयार करने में प्रयुक्‍त उपोत्‍पादों में किण्‍वन प्रक्रिया के लिए जरूरी नाइट्रोजन और अन्‍य संघटक, पर्याप्‍त मात्रा में नहीं होते, इस प्रक्रिया को शुरू करने के लिए, यह मिश्रण नाइट्रोजन और कार्बोहाइड्रेट्स से संपूरित किया जाता है।
स्‍पानिंग
स्‍पानिंग अधिकतम तथा सामयिक उत्‍पाद के लिए अंडों का मिश्रण है। अण्‍डज के लिए अधिकतम खुराक कम्‍पोस्‍ट के ताजे भार के 0.5 तथा 0.75 प्रतिशत के बीच होती है। निम्‍नतर दरों के फलस्‍वरूप माइसीलियम का कम विस्‍तार होगा तथा रोगों एवं प्रतिद्वान्द्वियों के अवसरों में वृद्धि होगी उच्‍चतर दरों से अण्‍डज की कीमत में वद्धि होगी तथा अण्‍डज की उच्‍च दर के फलस्‍परूप कभी-कभी कम्‍पोस्‍ट की असाधारण ऊष्‍मा हो जाती है।

ए बाइपोरस के लिए अधिकतम तापमान 230 से (+) (-) 20  से./उपज कक्ष में सापेक्ष आर्द्रता अण्‍डज के समय 85-90 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए।
कटाई

थैले को खोलने के 3 से 4 दिन बाद मशरूम प्रिमआर्डिया रूप धारण करना शुरू कर देते हैं। परिपक्‍व मशरूम अन्‍य 2 से 3 दिनों में कटाई के लिए तैयार हो जाते हैं। एक औसत जैविक कारगरहा (काटे गए मशरूम का ताजा भार जिसे एयर ड्राई सबट्रेट द्वारा विभक्‍त किया गया हो X100) 80 से 150 प्रतिशत के बीच हो सकती है और कभी-कभी उससे ज्‍यादा। मशरूम को काटने के लिए उन्‍हें जल से पकड़ा जाता है तथा हल्‍के से मरोड़ा जाता है तथा खींच लिया जाता है। चाकू का इस्‍तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। मशरूम रेफ्रीजेरेटर में 3 से 6 दिनों तक जाता बना रहता है।

मशरूम गृ‍ह/कक्ष
क्‍यूब तैयार करने का कक्ष
एक आदर्श कक्ष आर.सी.सी. फर्श का होना चाहिए, रोशनदानयुक्‍त एवं सूखा होना चाहिए। लकड़ी के ढांचे को रखने, क्‍यूब एवं अन्‍य आर.सी.सी. चबूतरा के लिए कक्ष के अंदर 2 सेमी ऊंचा चबूतरा बनाया जाना चाहिए, ऐसा भूसे के पाश्‍चुरीकृत थैलों को बाहर निकालने की आवश्‍यतानुसार होना चाहिए। जिन सामग्रियों के लिए क्‍यूब को बनाने की आवश्‍यकता है, उन्‍हें कक्ष के अंदर रखा जाना चाहिए। क्‍यूब को तैयार करने वाले व्‍यक्तियों को ही कमरे के अंदर जाने की अनुमति दी जानी चाहिए।
उठमायन कक्ष
उण्‍डजों के संचालन के लिए कमरा यह कमरा आरसीसी भवन अथवा आसाम विस्‍म (घर में कोई अलग कमरा) का कमरा होना चाहिए तथा खण्‍डों को रखने के लिए तीन स्‍तरों में साफ छेद वाले बांस की आलमारी लगाई जानी चाहिए। पहला स्‍तर जमीन से 100 सेमी ऊपर होना चाहिए तथा दूसरा स्‍तर कम से कम 60 सेमी ऊंचा होना चाहिए।
फसल कक्ष
एक आदर्श गृह/कक्ष आर.सी.सी. भवन होगा जिसमें विधिवत उष्‍मारोधन एवं कक्ष को ठंडा एवं गरम करने का प्रावधान स्‍थापित किया गया होगा। तथापि बांस, थप्‍पर तथा मिट्टी प्‍लास्‍टर जैसे स्‍थानीय रूप से उपलब्‍ध सामग्रियों का इस्‍तेमाल करते हुए स्‍वदेशी अल्‍प लागत वाले घर की सिफारिश की गई है। मिट्टी एवं गोबर के समान मिश्रण वाले स्पिलिट बांस की दीवारें बनाई जा सकती है।

कच्‍ची ऊष्‍मारोधक प्रणाली का प्रावधान करने के लिए घर के चारों ओर एक दूसरी दीवार बनाई जाती है जिसमें प्रथम एवं दूसरी दीवार के मध्‍य 15 सेमी का अंत्तर रखा जाता है। बाहरी दीवार के बाहरी तरफ मिट्टी का पलास्‍टर किया जाना चाहिए। दो दीवारों के मध्‍य में वायु का स्‍थान ऊष्‍मा रोधक का कार्य करेगा क्‍योंकि वायु ऊष्‍मा का कुचालक होती है। यहां तक कि एक बेहतर ऊष्‍मारोधन का प्रावधान किया जा सकता है यदि दीवारों के बीच के स्‍थान को अच्‍छी तरह से सूखे 8 ए छप्‍पर से भर दिया जाए। घर का फर्श वरीयत: सीमेंट का होना चाहिए किन्‍तु जहां यह संभव नही है, अच्‍छी तरह से कूटा हुआ एवं प्‍लास्‍टरयुक्‍त मिट्टी का फर्श पर्याप्‍त होगा। तथापि, मिट्टी की फर्श के मामले में अधिक सावधानी बरतनी होगी। छत मोटे छापर की तहो अथवा वरीयत: सीमेंट की शीटों की बनाई जानी चाहिए। छप्‍पर की छत से अनावश्‍यक सामग्रियों के संदूषण से बचने के लिए एक नकली छत आवश्‍यक है। प्रवेश द्वार के अलावा, कक्ष में वायु के आने एवं निकलने के लिए कमरे के आयु एंव पश्‍च भाग के ऊपर एवं नीचे दोनों तरफ से रोशनदानों का भी प्रावधान किया जाना चाहिए। घर तथा कक्षा ऊर्ध्‍वाधर एवं अनुप्रस्‍थ बांस के खम्‍भों के ढांचो का होना चाहिए जो ऊष्‍मायन अवधि के उपरान्‍त खंडों को टांगने के लिए अपेक्षित है। अनुप्रस्‍थ खम्‍भों को ऊष्‍मायन आलमारी के रूप में 3 स्‍तरीय प्रणाली में व्‍यवस्थि‍त किया जा सकता है। खम्‍भे वरीयत: दीवारों से 60 सेमी दूर तथा तीनों स्‍तरों की प्रत्‍येक पंक्ति के बीच में होने चाहिए, 1 सेमी की न्‍यूनतम जगह बनाई रखी जानी चाहिए। 3.0X2.5X2.0 मी. का फसल कक्ष 35 से 40 क्‍यूबों को समायोजित करेगा।

विधि
भूसे को हाथ के यंत्र से 3-5 सेमी लम्‍बे टुकडों में काटिए तथा टाट की बोरी में भर दीजिए। एक ड्रम में पानी उबालिए। जब पानी उबलना शुरू हो जाए तो भूसे के साथ टाट की बोरी को उबलते पानी में रख दीजिए तथा 15-20 मिनट तक उबालिए। इसके पश्‍चात फेरी को ड्रम से हटा लीजिए तथा 8-10 घंटे तक पड़े रहने दीजिए ताकि अतिरिक्‍त पानी निकल जाए तथा चोकर को ठंडा होने दीजिए। इस बात का ध्‍यान रखा जाए कि ब्‍लॉक बनाने तक थैले को खुला न छोड़ा जाए क्‍योंकि ऐसा होने पर उबला हुआ चोकर संदूषित हो जाएगा। हथेलियों के बीच में चोकर को निचोड़कर चोकर की वांछित नमी तत्‍व का परीक्षण किया जा सकता है तथा सुनिश्चित कीजिए कि पानी की बूंदे चोकर से बाहर न निकलें।
चोकर के पाश्‍चुरीकृत का दूसरा तरीका भापन है। इस तरीके के लिए ड्रम में थोड़े परिवर्तन की आवश्‍यकता होती है (ड्रम के ढक्‍कन में एक छोटा छेद कीजिए तथा चोकर को उबालते समय रबर की ट्यूब से ढक्‍कन के चारों ओर सील लगा दीजिए) टुकड़े-डुकड़े किए गए चोकर को पहले भिगो दीजिए तथा अतिरिक्‍त पानी निकाल दिया जाए। ड्रम में कुछ पत्‍थर डाल दीजिए तथा पत्‍थर के स्‍तर तक पानी उड़ेलिए। बांस की टोकरी में रखकर गीले चोकर को उबाल दें तथा ड्रम के अंदर पत्‍थर के ऊपर टोकरी को रख दें। ड्रम के ढक्‍कन को बंद कर दें तथा रबर की ट्यूब से ढक्‍कन की नेमि को सील कर दीजिए। उबले हुए पानी से उत्‍पन्‍न भाप चोकर से गुजरते हुए इसे पाश्‍चु‍रीकृत करेगी। उबालने के बाद चोकर को पहले से कीटाणुरहित किए गए बोरी में स्‍थानांतरित कर दिजिए तथा 8-10 घंटे तक इसे ठंडा होने के लिए छोड़ दीजिए।
लकड़ी का एक सांचा लीजिए तथा चिकने फर्श पर रख दीजिए। पटसून की दो रस्सियों ऊर्ध्‍वाधर एवं अनुप्रस्‍थ रूप में रख दीजिए। प्‍लास्टिक की शीट से अस्‍तर लगाइए जिसे पहले उबलते पानी में डुबोकर कीटाणुरहित किया गया है।
–        5 सेमी. के उबले चोकर को भर दीजिए तथा लकड़ी के ढक्‍कन की मदद से इसे सम्‍पीडित कीजिए तथा पूरी सतह पर स्‍पान को छिड़किए।
–        स्‍पानिंग की प्रथम तह के उपरान्‍त 5 सेमी का अन्‍य चोकर रखिए तथा सतह पर पुन: स्‍थान का छिड़काव करें तथा प्रथम तह में किए गए की तरह इसे सम्‍पीडित कीजिए। इस प्रकार तह पर स्‍पान को 4 से 6 तह तक के लिए तब तक छिड़किए जब तक चोकर सांचे के शीर्ष के स्‍तर तक न आ जाए। एक (1) एक पैकेट स्‍पान का इस्‍तेमाल 1 क्‍यूब अथवा ब्‍लाक के लिए किया जाना चाहिए।
–        अब प्‍लास्टिक की शीट सांचे की शीर्ष पर मोडी जाए प्‍लास्टिक के नीचे पहले रखी गई पटसून की रस्सियों से उसे बांध दिया जाए।
–        बांधने के उपरांत सांचे को हटाया जा सकता है तथा चोकर का आयताकर खंड पीछे बच जाता है।
–        वायु के लिए खंड के सभी तरफ छेद (2 मिमी व्‍यास) बनायें।
–        ऊष्‍मायन कक्ष में ब्‍लॉक को रख दीजिए उन्‍हें सरल तह में एक दूसरे के बगल रखा जाए तथा इस बात का ध्‍यान रखा जाए कि उन्‍हें फर्श पर अथवा एक दूसरे के शीर्ष पर सीधे न रखा जाए क्‍योंकि इससे अतिरिक्‍त ऊष्‍मा उत्‍पन्‍न होगी।
–        ब्‍लॉक का तापमान 250 से. पर रखा जाए। ब्‍लॉक के छिद्रों में एक तापमापक डालकर इसे नोट किया जा सकता है। यदि तापमान 250 से. से ऊपर जाता है तो कमरे में गैस भरने की सलाह दी जाती है। तथा यदि तापमान में गिरवाट आती है, तो कमरे को धीरे-धीरे गर्म किया जाना चाहिए।
–        पूरे पयाल में फैलने के लिए स्‍पान को 12 से 15 दिन लगता है तथा जब पूरा ब्‍लॉक सफेद हो जाए तो यह निशान है कि स्‍पान संचालन पूरा हो गया है।
–        अण्‍डज परिपालन के उपरांत ब्‍लॉक से रस्‍सी तथा प्‍लास्टिक की शीट को हटा दीजिए। नारियल की रस्‍सी से ब्‍लॉक को अनुप्रस्‍थ रूप में बांध दीजिए तथा इसे फसल कक्ष में लटका दीजिए। इस अवस्‍था से आगे कमरे की सापेक्ष आर्द्रता 85 प्रतिशत से कम नहीं होनी चाहिए। ऐसे दीवारों तथा कमरे की फर्श पर जल छिड़क करके समय-समय पर किया जा सकता है। यदि फर्श सीमेंट का है, तो सलाह दी जाती है कि फर्श पर पानी डालिए ताकि फर्श पर हमेश पानी रहे। यदि खंड हल्‍का से सूखने का लक्षण जिससे लगे तो स्‍प्रेयर के माध्‍यम से स्‍प्रे किया जा सकता है।
–        ए‍क सप्‍ताह से 10 दिन के भीतर ब्‍लॉक की सतह पर छोटे-छोटे पिन शीर्ष दिखाई पड़ेगे तथा ये एक या दो दिन के भीतर पूरे आकार के मशरूम हो जाएंगे।
–        जब फल बनना शुरू होता है तो हवा की जरूरत बढ़ जाती है। अत: जब एक बार फल बनना शुरू हो जाता है तो आवश्‍यक है कि हर 6 से 12 घण्‍टो बाद कमरे के सामने और पीछे दिए गए वेंटीलेटर खोलकर ताजी हवा अंदर ली जाए।
–        जब आवरणों की परिधि ऊपर की ओर मुड़ना शुरू हो जाती है तो फल काया (मशरूम) तोड़ने के लिए तैयार हो जाते है। ऐसा जाहिर होगा क्‍योंकि छोटी-छोटी सिलवटें आवरण पर दिखाई पड़ने लगती है। मशरूम को काटने के लिए अंगूठे एवं तर्जनी से आधार पर डाल को पकड़ लीजिए तथा हल्‍के क्‍लाकवाइज मोड़ से पुआल अथवा किसी छोटे मशरूम उत्‍पादन को विक्षोभित किए बिना मशरूम को डाल से अलग कर लीजिए। काटने के लिए चाकू अथवा कैंची का इस्‍तेमाल मत करें। एक सप्‍ताह के बाद ब्‍लॉक में फिर से फल आने शुरू हो जाएंगे।

उपज :
मशरूम प्रवाह में दिखाई पड़ते है। एक क्‍यूब से लगभग 2 से 3 प्रवाह काटे जा सकते है। प्रथम प्रवाह की उपज ज्‍यादा होती है तथा तत्‍पश्‍चात धीरे-धीरे कम होने लगती है तथा एक क्‍यूब से 1.5 किग्रा से 2 किग्रा तक के ताजे मशरूम की कुल उपज प्राप्‍त होती है। इसके बाद क्‍यूब को छोड़ दिया जाता है तथा फसल कक्ष से काफी दूर पर स्थित एक गड्ढे में पाट दिया जाता है अथवा बगीचे अथवा खेत में खाद के रूप में इसका इस्‍तेमाल किया जा सकता है।
परिरक्षण
मशरूम को ताजा खाया जा सकता है अथवा इसे सुखाया जा सकता है। चूंकि वे शीघ्र ही नष्‍ट हो जाने वाले प्रकृति के होते हैं तो आगे के इस्‍तेमाल अथवा दूरस्‍थ विपणन के लिए उनका परिरक्षण आवश्‍यक है। ओयेस्‍टर मशरूम को परि‍रक्षित करने का सबसे पुराना एवं सस्‍ता तरीका है धूप में सुखाना।
गर्म हवा में सुखाना कारगर उपयोग है जिसके द्वारा मशरूम को डिहाइड्रेटर (स्‍थानीय रूप से तैयार उपस्‍कर) नामक उपस्‍कर में सुखाया जाता है मशरूम को एक बंद कमरे में लगे हुए तार के जाल से युक्‍त रैक में रखा जाता है तथा गर्म हवा (500 से 550 से) 7-8 घंटे तक रैक के माध्‍यम से गुजरती है। मशरूम को सुखाने के बाद इसे वायुसह डिब्‍बे में स्‍टोर किया जाता है अथवा 6-8 माह के लिए पोलीबैग में सील कर दिया जाता है। पूरी तरह से सोखने के उपरांत मशरूम अपने ताजे वजन से कम होकर एक से घट कर तैरहवां भाग रह जाता है जो सुरक्षा के आधार पर अलग-अलग होता है। मशरूम को ऊष्‍ण जल में भिगोकर आसानी से पुन: जलित किया जा सकता है।
रोग एवं पीट
यदि मशरूम की देखभाल न की जाए तो अनेक रोग एवं पीट इस पर हमला कर देते हैं।
रोग
1.      हरी फफूंद (ट्राइकोडर्मा विरिडे) : यह कस्‍तूरा कुकुरमुत्ते में सबसे अधिक सामान्‍य रोग है जहां क्‍यूबों पर हरे रंग के धब्‍बे दिखाई पड़ते है।
1.
नियंत्रण : फॉर्मालिन घोल में कपड़े को डुबोइए (40 प्रतिशत) तथा प्रभावित क्षेत्र को पोंछ दीजिए। यदि फफूंदी आधे से अधिक क्‍यूब पर आक्रमण करती है तो सम्‍पूर्ण क्‍यूब को हटा दिया जाना चाहिए। इस बात की सावधानी रखी जानी चाहिए कि दूषित क्‍यूब को पुनर्संक्रमण से बचाने के लिए फसल कक्ष से काफी दूर स्‍थान पर जला दिया जाए अथवा दफना दिया जाए।
कीड़े
2.      मक्खियां : देखा गया है कि स्‍कैरिड मक्खियां, फोरिड मक्खियां, सेसिड मक्खियां कुकुरमुत्ते तथा स्‍पॉन की गंध पर हमला करती हैं। वे भूसी अथवा कुकुरमुत्ते अथवा उनसे पैदा होने वाले अण्‍डों पर अण्‍डे देती हैं तथा फसल को नष्‍ट कर देती हैं। अण्‍डे माइसीलियम, मशरूम पर निर्वाह करते हैं एवं फल पैदा करने वाले शरीर के अंदर प्रवेश कर जाते हैं तथा यह उपभोग के लिए अनुपयुक्‍त हो जाता है।
नियंत्रण : फसल की अवधि में बड़ी मक्खियों के प्रवेश को रोकने के लिए दरवाजों, खिडकियों अथवा रोशनदानों पर पर्दा लगा दीजिए यदि कोई, 30 मेश नाइलोन अथवा वायर नेट का पर्दा। मशरूम गृहों में मक्‍खीदान अथवा मक्खियों को भगाने की दवा का इस्‍तेमाल करें।
3.      कुटकी : ये बहुत पतले एवं रेंगने वाले छोटे-छोटे कीड़े होते हैं जो कुकुरमुत्ते के शरीर पर दिखाई देते हैं। वे हानिकारक नहीं होते है, किन्‍तु जब वे बड़ी संख्‍या में मौजूद होते है तो उत्‍पादक उनसे चिंतित रहता है।
3.
नियंत्रण : घर तथा पर्यावरण को साफ सुथरा रखें।
4.      शम्‍बूक, घोंघा : ये पीट मशरूम के पूरे भाग को खा जाते हैं जो बाद में संक्रमित हो जाते हैं तथा वैक्‍टीरिया फसल के गुणवत्ता पर बुरा प्रभाव डालते हैं।
नियंत्रण : क्‍यूब से पीटों को हटाइए तथा उन्‍हें मार डालिए। साफ सुथरी स्थिति को बनाये रखें।
अन्‍य कीटाणु
5.      कृन्‍तक : कृन्‍तकों का हमला ज्‍यादातर अल्‍प कीमत वाले मशरूम हाउसों पर पाया जाता है। वे अनाज की स्‍पॉन को खाते हैं तथा क्‍यूबों के अंदर छेद कर देते हैं।
नियंत्रण : मशरूम गृहों में चूहा विष चारे का इस्‍तेमाल करें। चूहों की बिलों को कांच के टुकडों एवं पलास्‍टर से बंद कर दें।
6.      इंक कैप (कोपरीनस सैप) यह मशरूम का खर-पतवार है जो फसल होने के पहले क्‍यूबों पर विकसित होता है। वे बाद में परिपक्‍वता अवधि पर काले स्लिमिंग काई में विखंडित हो जाते है।
6.
नियंत्रण : सिफारिश किए गए नियंत्रण उपाय ही कोपरीनस को क्‍यूब से शारीरिक रूप से हटा सकता है।
1 प्रस्‍तावित बजट :
क. पूंजीगत निवेश साख सहायता :
1 लाभग्राही
20,000 रू. प्रति लाभग्राही की दर से अभिनिर्धारित    
20 लाभगुष्ठियों को साख निवेश सहायता
4,00,000.00 रू
(20,000X20 रू.) उपयुक्‍त 4.3 की व्‍याख्‍या देखें
2 स्‍पान केंद्र :
अवसंरचना लागत, कार्यात्‍मक लागत तथा
क्रय साख पूंजी उपर्युक्‍त 4.3 के अन्‍तर्गत
 2,10,900.00 रू.
दर्शाए गए 6,10,900.00 रू.
ख कार्यात्‍मक अनुदान
1. वैज्ञानिक शीतोषण मशरूम कृषि में समान
1.20 लाभग्राहियों के लिए प्रशिक्षण
10,000.00 रू.
2. निम्‍न की दर से प्रोजेक्‍ट के समन्‍वयकर्ता का वेतन
2.5000 रू. प्रति माह
 60,000.00 रू.
2.(5000X12 माह)
3.  विशेषज्ञों से तकनीकी/संसाधन सहायता 10,000.00 रू.
4.            कुल बजट (संचार, लेखन सामग्री तथा
सहयोगी स्‍थापना लागत) के 10 प्रतिशत
का प्रशासनिक व्‍यय
87,600.00 रू.
महायोग
7,78,500.00 रू.
परियोजना प्रस्‍ताव संघटक
एआरटीएस दिशा-निर्देशों के अनुसार परियोजना प्रस्‍ताव तैयार किया जाता है।
प्रस्‍तावित कार्यकलापों एवं तौर तरीकों को इस प्रकार विनिर्दिष्‍ट किया जाना चाहिए :
जागरूकता सृजन एवं प्रेरणा
प्रशिक्षण
कृषि
– कम्‍पोस्‍ट तैयार करना
– मशरूम गृह /‍ कक्षों की तैयारी क्‍यूब निर्माण कक्ष / उष्‍मायन कक्ष / फसल कक्ष
– स्‍पान / कृषि
अर्द्ध प्रसंस्‍करण/आवेष्‍टन
विपणन
प्रलेखन एवं प्रकाशन
स्‍टाफ का वेतन
यात्रा/यात्रा भत्ता/मंहगाई भत्ता
उपस्‍कर
आकस्मिकताएं/ अप्रत्‍यशित व्‍यय
9        बजट
9
i                       अवसंरचना (सायबान आदि)
i
ii                     उपस्‍कर (ट्रे, पॉली‍थीन के थैले, सिलींडर, ड्रम आदि)
ii
iii                    कच्‍ची सामग्रियां एवं रसदें (स्‍ट्रॉ रसायन आदि)
iii
iv                   जागरूकता एवं प्रशिक्षण
iv
v                     वेतन (तकनीकी समर्थन/परमर्श/पर्यवेक्षक/कृषि कार्यकर्ता)
v
vi                   प्रसंस्‍करण एवं आवेष्‍टन
vi
vii                  विपणन सम्‍पर्क
vii
viii                अप्रत्‍याशा/विविध
viii
ix                   प्रशासनिक व्‍यय
ix

मशरूम की व्यासायिक खेती

मशरूम की व्यासायिक खेती: 
अतिरिक्त आय का आकर्षक स्त्रोत

प्राचीन काल से ही मशरूम की कई किस्मों में से खाने योग्य किस्मों का चुनाव  मानव करना सीख गया था एवं अपनी रसोई में इसका कई प्रकार से उपयोग प्रारंभ करा चुका था । किन्तु मशरूम की खेती का इतिहास बहुत पुराना नहीं है । जहॉं पूर्व में मशरूम को बादल के गरजने से उपजने वाली वनस्पति रूप में ही देखा जाता था, वहीं आज आधुनिक कृषि विज्ञान तकनीक के कारण यह वर्ष में छह से नौ महीने तक उगाया जा सकता है । मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ सर्वाधिक महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि इसकी खेती भूमिहीन कृषक एवं मजदूर भी कर सकते है क्योंकि इसकी खेती के लिये भूमि की आवश्यकता नहीं होती है । मशरूम की खेती से जुड़ा हुआ एक रोचक तथ्य यह भी है कि इसकी उपज मात्र 21 दिन से ही प्राप्त होनी शुरू हो जाती है ।

मशरूम के एक थैले को तैयार करने में लगभग रू. आठ से दस की लागत आती है । एक थैले से लगभग दो से सवा दो किलो ताजा मशरूम प्राप्त होता है । बड़े शहरों में मशरूम के विक्रय दर रू. पचास से साठ तक प्राप्त होती है जिससे रू. चालीस से पचास शुद्ध आय प्राप्त की जा सकती है ।

मशरूम का पोषक मान: 
       100 ग्राम ताजे मशरूम में 88.5 ग्राम जलांश (नमी), 3.1 ग्राम प्रोटीन, 0.8 ग्राम वसा, 1.4 ग्राम खनिज लवण, 0.44 ग्राम रेशा, 4.3 ग्राम कार्बोज़, 33 किलो कैलोरी ऊर्जा, 6 मिली ग्राम कैल्शियम, 110 मिली ग्राम फॉस्फोरस, 1.5 मिल ग्राम लौह तत्व उपस्थित होता है ।

मशरूम की खेती हेतु सामग्री :
मशरूम की खेती हेतु निम्नलिखित सामग्री आवश्यक है –
भूसा, फार्मेल्डिहाईड, बैविस्टिन, मशरूम की बीज (स्पॉन) , 14×18 इंच आकार की पॉलीथिन, 4×3 मीटर आकार की पॉलीथिन शीट, सुतली, टोंचा, ब्लेड, 2 बड़ी बाल्टी, 1 मग पीने योग्य स्वच्छ जल, साबुन, साफ तौलिया एवं झारा ।
मशरूम की खेती हेतु आवश्यक एवं अनुकूल परिस्थितियाँ:
तापमान एवं आद्रर्ता (नमी)
मशरूम की खेती के लिये आवश्यक तापमान एंव आद्रर्ता वर्षा ऋतु के प्राकृतिक तापमान एवं आद्रर्ता के समान ही होना चाहिए । यह लगभग 25 से 35 डिग्री सैल्सियस तथा 80 से 90 प्रतिशत आद्रर्ता होती है। वर्षा ऋतु में यह स्थिति प्राकृतिक रूप से उपलब्ध रहती है किन्तु वर्षा के उपरांत इस स्थिति का निर्माण निम्नलिखित रूप से किया जा सकता है –
·           मशरूम के थैले को स्वच्छ एवं सुरक्षित, अंधेरे, हवादार तथा ठंडे कमरे में रख कर तथा फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर ।

·           मशरूम के थैले को दिन में कम से कम पाँच से छह बार तथा रात में दो से तीन बार पानी से (झारे द्वारा) से सींचा कर, तर करके ।
·           मशरूम की खेती जून माह में पहली वर्षा के उपरांत से लेकर फरवरी माह के अन्त तक करके ।
·           बड़े स्तर पर घास की अथवा खस की झोपड़ी बना कर, झोपड़ी की घास को गीला रखते हुये, फर्श पर रेत की पर्त बिछा कर, झोपड़ी के भीतर तापमान तथा आद्रर्ता को नियंत्रित करते हुये मशरूम की खेती करके ।
मशरूम कक्ष की स्वच्छता:
·           मशरूम कक्ष वह कक्ष है जिसमें मशरूम के थैलों की भराई तथा बीज रोपित किया जाता है एवं इन थैलों को टाँगा जाता है
·           बाहर उपयोग किये गये जूते-चप्पल, कक्ष के बाहर उतारें तथा कक्ष में प्रवेश करने हेतु उपयोग की जाने वाली चप्पल पहनकर ही प्रवेश करें ।
·           मशरूम के थैलों को हाथ लगाने के पूर्व अपने हाथ साबुन तथा स्वच्छ जल के अच्छी प्रकार धोयें ।
·           हाथ धोने के उपरान्त फार्मल्डिहईड के दो प्रतिशत घोल से हाथ धोयें ।
·           मशरूम कक्ष में कार्य खत्म करने के उपरान्त कक्ष से बाहर आकर साबुन तथा स्वच्छ जल से अच्छी तरह हाथ फिर से धोयें ।
·           यदि कमरों का फर्श पक्का हो तो अच्छी तरह बुहार कर फिनाईल से पोछा लगायें ।
·           दीवारों पर लगे जाले हटायें तथा दीवारों को बुहार लें ।
·           फार्मल्डिहाईड 1 सें 2 प्रतिशत तथा बैविस्टीन का 0.05 प्रतिश्त का स्वच्छ जल में घोल बनायें तथा इस घोल का छिड़काव दीवारों पर करें ।
·           चूहे इत्यादि के बिल को बंद करें । चूहे तथा अन्य कीड़े के मशरूम कक्ष में प्रवेश को रोकने के लिये दरवाजें, खिड़कियों तथा दीवारों के सूराखों तथा दरारों को बंद करें ।
·           यदि मशरूम कक्ष की छत कबेलू की हो तो कबेलू के नीचे, स्वच्छ चादर (पाल) लगायें जिसे समय-समय पर धोलें।
·           कच्ची फर्श को गोबर से अच्छी प्रकार लीप लें ।
·           फर्श (कच्ची या पक्की) का उपचार करने के उपरान्त, छनी हुई बारीक रेत की लगभग छह इंच की पर्त बिछायें जिससे मषरूम कक्ष में ठंडक बनी रहेगी ।
·           कक्ष में चूहा पकड़ने का पिंजरा अवश्य रखें ।
·           मशरूम बैग भरते समय तथा मशरूम की तुड़ाई करते समय बालों को धुले हुये कपड़े से कस कर बाँधे तथा महिलायें अपनी चूड़ियों को धुले हुये कपड़े से हाथ पर बॉध लें ।
·           अनजान व्यक्ति का प्रवेश मशरूम कक्ष में वर्जित रखें ।
मशरूम की खेती हेतु स्वच्छता:
व्यक्तिगत तथा स्थान की मशरूम की खेती हेतु स्वच्छता अत्यंत आवश्यक है । ज़रा सी चूक के कारण ज़हीरले अथवा न जा खाने योग्य मशरूम उगने आरंभ हो सकते हैं । स्वच्छता बनाये रखने हेतु निम्नलिखित कार्य करने चाहिये –
व्यक्तिगत स्वच्छता:
·              नेलकटर द्वारा नाखून काटें ।
·              शरीर को खरोंचने, खुजली करने, बालों में हाथ फिराने, थूकने, छीकनें, खाँसने, नाक पोछने, तम्बाकू खाने, बीड़ी अथवा सिगरेट पीने, जैसी गंदी आदतों से दूर रहें ।
·              अच्छी गुणवत्ता के साबुन तथा स्वच्छ जल से स्नान करें तथा स्वच्छ सूखी तौलियें से शरीर पोंछे ।
·              दाद, खाज, खुजली, खाँसी, जुखाम जैसे रोगों का उपचार करवायें ।
·              कपड़े धोने के उचित गुणवत्ता के साबुन अथवा डिटेर्जंट पाऊडर से धुले हुये कपड़े धारण करें ।
मशरूम की खेती की विधि:
भूसे का उपचार- भूसे उपचार दो प्रकार से किया जा 

Mushrooms

Mushrooms overview

भारत में मशरूम का प्रयोग सब्‍जी के रूप में किया जाता है। खुम्‍बी की कई प्रजातियां भारत मे उगाई जाती है। फ्ल्‍यूरोटस की प्रजातियों को सामान्‍यतया: ढींगरी खुम्‍बी कहते हैं। अन्‍य खुम्बियों की तुलना में सरलता से उगाई जाने वाली ढींगरी खुम्‍बी खाने में स्‍वादिष्‍ट, सुगन्ध्ति, मुलायम तथा पोषक तत्‍वों से भरपूर होती है। इसमे वसा तथा शर्करा कम होने के कारण यह मोटापे, मधुमेह तथा रक्‍तचाप से पीडित व्‍यक्तियों के लिए आर्दश आहार है। 

भारत में खुम्‍बी उत्‍पादकों के दो समुह हैं
 एक जो केवल मौसम में ही इसकी खेती करते हैं 
दूसरे जो सारे साल मशस्‍म उगाते हैं।
व्‍यवसायिक रूप से तीन प्रकार की खुम्‍बी उगाई जाती है।
  • बटन (Button) खुम्‍बी,
  •  ढींगरी (Oyster) खुम्‍बी तथा 
  • धानपुआल या पैडीस्‍ट्रा (Paddystraw) खुम्‍बी। 
तीनो प्रकार की खुम्‍बी को किसी भी हवादार कमरे या सेड में आसानी से उगाया जा सकता है। भारत में ढींगरी खुम्‍बी की खेती मौसम के अनुसार अलग-अलग भागों मे की जाती है।

ढींगरी मशरूम उगाने का सही समय। 
Sowing time of Oyster mushroom
दक्षिण भारत तथा तटवर्ती क्षेत्रों में सर्दी का मौसम विशेष उपयुक्‍त है। उत्‍तर भारत में ढींगरी खुम्‍बी उगाने का उपयुक्‍त समय अक्‍तुबर से मध्‍य अप्रैल के महीने हैं। ढींगरी खुम्‍बी की फसल के लिए 20 से 28 डिग्री सेंटीग्रेड तापमान त‍था 80-85% आर्द्रता बहुत उपयुक्‍त होती है।
ढींगरी की 12 से अधिक प्रजातियॉ भारत के विभिन्‍न भागों में उगायी जाती हैं। 
  • फ्ल्‍यूरोटस सजोरकाजू, 
  • फ्ल्‍यूरोटस फ्लोरिडा, 
  • फ्ल्‍यूरोटस ऑस्ट्रिएटस, 
  • फ्ल्‍यूरोटस फ्लेबेलेटस तथा 
  • फ्ल्‍यूरोटस सिट्रोनोपिलेटस आदि प्रमुख प्रजातियॉ है। 

ढींगरी मशरूम को उगाने की विधि।
Sowing technique of Oyster Mushroom
ढींगरी की फ्ल्‍यूरोटस सुजोरकाजू प्रजाति को धान के पुआल पर उगाने के लिए पुआल को 3-5 सेमी लम्‍बे टुकडो में काट कर स्‍वच्‍छ जल में रात भर के लिए भिगो दें। अगली सुबह अतिरिक्‍त पानी निकाल दें। 

ढींगरी मशरूम की बीजाई या स्‍पानिंग 
Spaning of Dhingri mushroom
मशरूम के बीज को स्‍पान कहतें हैं। भूसे के वजन के 5-7% के बराबर ढींगरी का बीज या स्‍पान लेकर उसे गीले भूसे में मिला दें। यदि तापमान कम हो तो बीज की मात्रा 25 % तक बढा दें। बीजाई या तो परतों में करें या फिर भूसे मे एकसार मिला दें।
बीज मिले भूसे को छिद्रयुक्‍त 45 X 30 आकार की पालिथिन की थैलियों में दो तिहाई भरकर थैली का मुहॅ बांध दें। थैलियों का आकार आवश्‍यकतानुसार छोटा या बडा भी प्रयोग किया जा सकता है। 
चाकोर खण्‍डों में उगाने के लिए उपयुक्‍त आकार के सांचे या लकडी की पेटी का प्रयोग करें। सांचे या पेटी में पॉलिथीन की छिद्रयुक्‍त सीट बिछा दें। अब सॉचे में उपरोक्‍त बताये अनुसार तैयार किया बीजयुक्‍त भूसा भर दें या फिर भूसा भरकर परतों में बीजाई कर दें। भूसे को हल्‍के हाथ से दबा दें तथा पॉलिथीन के खंड को सॉचे से बाहर निकाल दें।
बीजाई के बाद मशरूम की देखभाल 
Post spaning care of Oyster
कवक जाल का बनना: 
बीजाई के पश्‍चात पेटी अथवा थैलियों को खुम्‍बी कक्ष में टांडो पर रख दें तथा इन पर पुराने अखबार बिछाकर पानी से भिगो दें। कमरे मे पर्याप्‍त नमी बनाने के लिए कमरे के फर्स व दीवारों पर भी पानी छिडकें। इस समय कमरे का तापमान 22 से 26 डिग्री सेंन्‍टीग्रेड तथा नमी 80 से 85 प्रतिशत के बीच होनी चाहिए। अगले 10 से 12 दिनों में खुम्‍बी का कवक जाल सारे भूसे में फैल जाएगा। इस अवस्‍था में भूसा परस्‍पर चिपक कर मजबूत हो जाता है तथा इधर उधर लेजाने पर टूटता नही। अब पालिथीन काट कर या खोलकर अलग करदें । पालिथीन रहित बेलनाकार या चाकोर खण्‍डो को टांड पर अगल बगल लगभग एक फुट की दूरी पर रख दें। दिन में दो बार पानी छिडक कर नमी 85 से 90 % बनाए रखें। 
खुम्‍बी फलनकाय का बनना तथा उनकी तुडवाई: 
उपयुक्‍त तापमान (24 से 26 C) पर अगले लगभग 10-12 दिन बाद भूसे पर छोटी-छोटी खुम्‍बियां दिखाई देने लगती हैं जो अगले चार पॉच दिनों में पूरी बढ जाती हैं। 
जब खुम्‍बी के फलनकाय के किनारे भीतर की ओर मुडने लगे तब खुम्‍बी को तेज चाकू से काटकर या डंठल को मरोडकर निकाल लें। 8-10 दिनों के अन्‍तराल पर खुम्‍बीयों की 2-3 फसल आती हैं जिनसे लगभग 95 % उपज प्राप्‍त हो जाती है। 

ढींगरी की पैदावार तथा भंडारण 
Production and storage of Oyster
सामान्‍यत: 1.5 किलोग्राम सूखे पुआल या 6 किलोग्राम गीले भूसे से लगभग एक किलोग्राम ताजी खुम्‍बी आसानी से प्राप्‍त होती है। उत्‍तम फार्मप्रबंधन तथा रोगों से बचाव करके अधिक उपज भी प्राप्‍त की जा सकती है। 

खुम्‍बी को ताजा ही प्रयोग करना श्रेष्‍ठ होता है परन्‍तू फ्रिज में 5 डिग्री ताप पर 4-5 दिनों के लिए इनका भंडारण भी किया जा सकता है। धुप में यांत

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